Thursday, August 26, 2010

कविताएँ - 4

राग-बाज़ार

सोच  रहा हूँ किसी तरह से
निकल आयें बस आम के दाम
औंधे मुंह हैं बाज़ारों में कोइलसिया गुठली के दाम .

मैनहटन से हगन हटी तक पैसा पैसा
बस पैसा
किसी ने अरबों खरबों देकर भी
एक साँस खरीदी क्या ?
खिचड़ी से हालात
कलेजा गुठली जैसा सख्त हुआ
नमक - पसीजे रिश्ते हो गए
काठ की हांड़ी वक्त हुआ
सुट्टा  मार के पूंजीवादी मार्क्सवाद का भक्त  हुआ .

ख़ता माफ़ हो गाँधी बाबा
जय मां दुर्गे लाल सलाम !

दिल की दूरी मंगल जितनी
और मंगल की चार परग
एक ही   प्लाट पर सच  और झूट के बंग्लें हैं पर अलग अलग .

मैन अज्ञानी क्या बतलाऊँ
आप सभी खुद ज्ञानी हो
जीवन बेशक घिसरौअवां हो पर सपना तूफानी हो
उनकी जेब में डालर हो
पर अपनी जेब में पानी हो .

अंत बचा के रख ले बुरबक
आयेंगे ईंधन के काम .

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