याद ऐसे में तुम्हारी आई भी |
अब तलक तो एक भरोसा था मगर
टल गयी अब ज़ख्म की सुनवाई भी |
दस्तरस में चाँद था तो आपके
दिल में थी जो बात लब पर आई भी ?
इतनी सस्ती हो गयीं आसानियाँ
काम अब आती नहीं कठिनाई भी |
अब किसे नालिश करूँ मेरे ख़ुदा
उन दरिंदों में था मेरा भाई भी |
पंच, पनघट, डीह, पंछी, सब के सब
चुप लगा गयी पोखरे की काई भी |
गाँव का हर आदमी धरने पे है
अलगू पांड़े, रामजस हलवाई भी |
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