Monday, August 23, 2010

गज़लें - 4

दर्द भी है नींद भी तन्हाई भी
याद  ऐसे  में  तुम्हारी  आई  भी |
अब तलक तो एक भरोसा था मगर  
टल गयी अब ज़ख्म की सुनवाई भी |
दस्तरस में चाँद था तो आपके
दिल में थी जो बात लब पर आई भी ?
इतनी सस्ती हो गयीं आसानियाँ
काम अब आती नहीं कठिनाई भी |
अब किसे नालिश करूँ मेरे ख़ुदा
उन दरिंदों में था मेरा भाई भी |
पंच, पनघट, डीह, पंछी,  सब के सब
चुप लगा गयी पोखरे की काई भी |
गाँव का हर आदमी धरने पे है 
अलगू पांड़े, रामजस हलवाई भी | 


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