Thursday, August 5, 2010

ग़ज़लें-1

ये मेरी आंख का देखा हुआ है
निगाह-  - मीर को धोखा हुआ है .
तुम्हारा झूठ दीमक खा रहे हैं
मेरा सच आज तक रक्खा हुआ है .
अकीदों में नहीं हाँ पोथियों में
अँधेरा इन दिनों उजला हुआ है.
नदी में कोई तब्दीली नहीं है
मगर पानी जरा बहका हुआ है.
कि कोई सांस लेना भूल जाये
तुम्हीं  सोचो कभी ऐसा हुआ है ?
हुए कागज़ पे जबसे रिश्ते पक्के
भरोसा थोड़ा सा कच्चा हुआ है.
मुकम्मल था मेरा ईमान  पहले
ख़ुदा को देख कर आधा हुआ है.
21.07.2010

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