Wednesday, August 25, 2010

कविता - 1

कला

कला तो है
पर तेरा काव्य उपयोगी नहीं है
कला की भूखी है दुनियां मनोरोगी नहीं है

कला परवान तब चढ़ती है
जब थाली से जुड़ती है
सियासी  ऐश करती सोच कंगाली  से जुड़ती है
गुलामी जुल्म  पस्ती दर्द बदहाली से जुड़ती है
कला कविता पसीने की तरह से जब निचुडती  है

विचारों की  कलम से
दिल ने लिख्खी हो अगर कविता
तो भाषा लाँघ कर अनपढ़ भी पढ़ लेता है जस का तस
नवों रस से बड़ा होता है जीवन -रस .

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