Thursday, August 26, 2010

कविता - 2

यह कैसा जीवन


 यह कैसा आकाश
कि जैसे छूट रहा हो रंग
नई नीली साड़ी का .


यह कैसी धरती
जैसे उंगली से चाट रही अछ्वाइन 
 तेल निचोड़े बसियाइन  सी कोई जच्चा .


यह कैसा दिन
जैसे दौड़ो  दौड़ो देखो गाड़ी छूटी


यह कैसा जीवन
सबके सब साट रहे हैं
थूक लगा के नोट सटा के किस्मत फूटी .


यह कैसी है शाम
कि जैसी मटमैली  पियरी  पहने बादल
श्रम से लथपथ
लौट रहे अपने सूने अधियारे में फिर खो जाने को
पुनः जानवर हो जाने को .


यह कैसी हिंदी कविता
जिसमें फ़िराक़ के शेर गूंजते
मुक्तिबोध  शमशेर  समय की सूप फटकते
तिलमिलाए बाबा नागार्जुन पांव पटकते  .


यह कैसा समाज   यह कैसा जीवन
जिसमें  इतना जीवन
रिसता  घिसता  पिसता  जीवन
तुरपन जीवन    बंधन जीवन
सासों का अभिनन्दन जीवन
कोहबर से लेकर मसान तक
इतने रंग की इतनी भाषा
बासी पड़ी नहीं अभिलाषा
कौन समझ पाया   कब क्या है   जीवन के मन में .
२६/०८/२०१० 

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