Wednesday, August 25, 2010

गज़लें - 7

हवा का बोझ हवाओं से उठाया न गया
मेरे बदन का पसीना भी सुखाया न गया .
मैं उसके पास कई बार कई बार गया
मगर ख़ुदा से तो एक बार भी आया न गया .
दिमाग़ से तो उसे भूल गया हूँ कब का
न जाने क्यों वो मगर दिल से भुलाया न गया .
वो मेरे दर्द से वाकिफ़ था मैं उसके दिल से
न उससे पुछा गया , मुझ से बताया न गया .
जुड़े न हाथ कभी और न दुआ में ही  उठे
नतीज़ा जो भी रहा, हाथ बढ़ाया न गया .
२५.०८.2010

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