देह रसगर
पड़ रही हो जैसे हल्की हल्की छाया रोशनी पर
छू रहे आकाश को सहला रहा नीला समंदर
फाट पड़ने पड़ने को है देह रसगर .
दूध में जैसे बताशा घुल रहा है
शाम जैसे जैसे गहरी हो रही है
वैसे वैसे रोशनी का रंग थोड़ा खुल रहा है
हो उठी है देह नागर, आदिवासी .
कर रही श्रृंगार मौसम के उदासी
जाने कैसी एक खुदाई चाल रही है मन के अन्दर
और उभरने लग गया है मुम्बई में एक बस्तर .
गाढ़ा गाढ़ा लिख गए हैं ढाई आखर
दिल के भीतर
ये तुम्हारे नयन पातर .
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