Monday, August 23, 2010

गज़लें - 3

वो देखो वो टीवी  के टावर पर चढ़ता चाँद 
मुझे  देखते  देख लिया तो और अकड़ता चाँद .
पंद्रह दिन की रात की पाली वाली ड्यूटी  है
दौड़ रहा है खिड़की - खिड़की  ट्रेन पकड़ता चाँद .
चाँद रात में  नदिया तीरे मैं  तुम  तन्हाई
लहर पकड़ती हुई लहर और चाँद पकड़ता चाँद.
रेत के नीले सागर में भूखे, टूटे, हारे
भटके हुए मुसाफ़िर जैसा आगे बढ़ता चाँद .
सुखिया दुनिया दुखियारों से मन बहलाती है
फांस लगी मेरी यादों में आके गड़ता चाँद.
धंधेबाजों जैसा अमृतसर में गुरुवाणी
और अजमेर शरीफ़ में जाके कलमा पढ़ता चाँद.
सूरज की बाइक से घायल नीले घुटनों पर
दर्द से पियराई रातों में पपड़ी पड़ता चाँद.  

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