Wednesday, August 25, 2010

गज़लें - 5

बिना बताए ज़ेहन में मेरे आने से रही
वो कोई बात अपने आप बताने से रही .
मैं कैसे उसके साथ एक ज़माने से रही
बगैर उसके नींद भी तो सताने से रही .
न कोई ख़त न कोई फ़ोन न चर्चा कोई
हवा तो ख़ैर हाल - चाल बताने से रही .
नदी हूँ , पाप - गांठ खोल तो सकती हूँ मगर
दिलों के बीच गांठ कोई लगाने से रही .
ज़रुरियात आदमी की  अगर कम न हुईं
तो कायनात उसका  ख़र्च उठाने से रही .
हमें ही स्याह और सफ़ेद में चुनना  है मियां
कोई छड़ी तो राजनीति घुमाने से रही .
जला के भस्म अपने दिल का कोई दे दे तभी
उरूज अपने आप शायरी पाने से रही .
२४.८.१०

No comments:

Post a Comment