हम वक़्त की ज़बान में ये बात कह रहे
ठहरे हुए समाज में भी लोग बह रहे .
अब ले कहाँ से आएं आलीशान ज़िन्दगी
जो है उसी को साफ - सूफ करके रह रहे .
कविता नहीं ये ज़िन्दगी है आप की हज़ूर
सहना है गर कठिन तो आप काहे सह रहे .
अपनी तो ज़िंदगी अदावतों में ही कटी
बच्चों के बीच में तो कम से कम सुलह रहे.
ईमेल,एस एम एस में, जेब में भी है मगर
दिल में भी तो सलाम - दुआ की जगह रहे .
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