राग-बाज़ार
सोच रहा हूँ किसी तरह से
निकल आयें बस आम के दाम
औंधे मुंह हैं बाज़ारों में कोइलसिया गुठली के दाम .
मैनहटन से हगन हटी तक पैसा पैसा
बस पैसा
किसी ने अरबों खरबों देकर भी
एक साँस खरीदी क्या ?
खिचड़ी से हालात
कलेजा गुठली जैसा सख्त हुआ
नमक - पसीजे रिश्ते हो गए
काठ की हांड़ी वक्त हुआ
सुट्टा मार के पूंजीवादी मार्क्सवाद का भक्त हुआ .
ख़ता माफ़ हो गाँधी बाबा
जय मां दुर्गे लाल सलाम !
दिल की दूरी मंगल जितनी
और मंगल की चार परग
एक ही प्लाट पर सच और झूट के बंग्लें हैं पर अलग अलग .
मैन अज्ञानी क्या बतलाऊँ
आप सभी खुद ज्ञानी हो
जीवन बेशक घिसरौअवां हो पर सपना तूफानी हो
उनकी जेब में डालर हो
पर अपनी जेब में पानी हो .
अंत बचा के रख ले बुरबक
आयेंगे ईंधन के काम .
Thursday, August 26, 2010
कविता - 3
देह रसगर
पड़ रही हो जैसे हल्की हल्की छाया रोशनी पर
छू रहे आकाश को सहला रहा नीला समंदर
फाट पड़ने पड़ने को है देह रसगर .
दूध में जैसे बताशा घुल रहा है
शाम जैसे जैसे गहरी हो रही है
वैसे वैसे रोशनी का रंग थोड़ा खुल रहा है
हो उठी है देह नागर, आदिवासी .
कर रही श्रृंगार मौसम के उदासी
जाने कैसी एक खुदाई चाल रही है मन के अन्दर
और उभरने लग गया है मुम्बई में एक बस्तर .
गाढ़ा गाढ़ा लिख गए हैं ढाई आखर
दिल के भीतर
ये तुम्हारे नयन पातर .
पड़ रही हो जैसे हल्की हल्की छाया रोशनी पर
छू रहे आकाश को सहला रहा नीला समंदर
फाट पड़ने पड़ने को है देह रसगर .
दूध में जैसे बताशा घुल रहा है
शाम जैसे जैसे गहरी हो रही है
वैसे वैसे रोशनी का रंग थोड़ा खुल रहा है
हो उठी है देह नागर, आदिवासी .
कर रही श्रृंगार मौसम के उदासी
जाने कैसी एक खुदाई चाल रही है मन के अन्दर
और उभरने लग गया है मुम्बई में एक बस्तर .
गाढ़ा गाढ़ा लिख गए हैं ढाई आखर
दिल के भीतर
ये तुम्हारे नयन पातर .
कविता - 2
यह कैसा जीवन
यह कैसा आकाश
कि जैसे छूट रहा हो रंग
नई नीली साड़ी का .
यह कैसी धरती
जैसे उंगली से चाट रही अछ्वाइन
तेल निचोड़े बसियाइन सी कोई जच्चा .
यह कैसा दिन
जैसे दौड़ो दौड़ो देखो गाड़ी छूटी
यह कैसा जीवन
सबके सब साट रहे हैं
थूक लगा के नोट सटा के किस्मत फूटी .
यह कैसी है शाम
कि जैसी मटमैली पियरी पहने बादल
श्रम से लथपथ
लौट रहे अपने सूने अधियारे में फिर खो जाने को
पुनः जानवर हो जाने को .
यह कैसी हिंदी कविता
जिसमें फ़िराक़ के शेर गूंजते
मुक्तिबोध शमशेर समय की सूप फटकते
तिलमिलाए बाबा नागार्जुन पांव पटकते .
यह कैसा समाज यह कैसा जीवन
जिसमें इतना जीवन
रिसता घिसता पिसता जीवन
तुरपन जीवन बंधन जीवन
सासों का अभिनन्दन जीवन
कोहबर से लेकर मसान तक
इतने रंग की इतनी भाषा
बासी पड़ी नहीं अभिलाषा
कौन समझ पाया कब क्या है जीवन के मन में .
२६/०८/२०१०
यह कैसा आकाश
कि जैसे छूट रहा हो रंग
नई नीली साड़ी का .
यह कैसी धरती
जैसे उंगली से चाट रही अछ्वाइन
तेल निचोड़े बसियाइन सी कोई जच्चा .
यह कैसा दिन
जैसे दौड़ो दौड़ो देखो गाड़ी छूटी
यह कैसा जीवन
सबके सब साट रहे हैं
थूक लगा के नोट सटा के किस्मत फूटी .
यह कैसी है शाम
कि जैसी मटमैली पियरी पहने बादल
श्रम से लथपथ
लौट रहे अपने सूने अधियारे में फिर खो जाने को
पुनः जानवर हो जाने को .
यह कैसी हिंदी कविता
जिसमें फ़िराक़ के शेर गूंजते
मुक्तिबोध शमशेर समय की सूप फटकते
तिलमिलाए बाबा नागार्जुन पांव पटकते .
यह कैसा समाज यह कैसा जीवन
जिसमें इतना जीवन
रिसता घिसता पिसता जीवन
तुरपन जीवन बंधन जीवन
सासों का अभिनन्दन जीवन
कोहबर से लेकर मसान तक
इतने रंग की इतनी भाषा
बासी पड़ी नहीं अभिलाषा
कौन समझ पाया कब क्या है जीवन के मन में .
२६/०८/२०१०
Wednesday, August 25, 2010
गज़लें - 7
हवा का बोझ हवाओं से उठाया न गया
मेरे बदन का पसीना भी सुखाया न गया .
मैं उसके पास कई बार कई बार गया
मगर ख़ुदा से तो एक बार भी आया न गया .
दिमाग़ से तो उसे भूल गया हूँ कब का
न जाने क्यों वो मगर दिल से भुलाया न गया .
वो मेरे दर्द से वाकिफ़ था मैं उसके दिल से
न उससे पुछा गया , मुझ से बताया न गया .
जुड़े न हाथ कभी और न दुआ में ही उठे
नतीज़ा जो भी रहा, हाथ बढ़ाया न गया .
२५.०८.2010
मेरे बदन का पसीना भी सुखाया न गया .
मैं उसके पास कई बार कई बार गया
मगर ख़ुदा से तो एक बार भी आया न गया .
दिमाग़ से तो उसे भूल गया हूँ कब का
न जाने क्यों वो मगर दिल से भुलाया न गया .
वो मेरे दर्द से वाकिफ़ था मैं उसके दिल से
न उससे पुछा गया , मुझ से बताया न गया .
जुड़े न हाथ कभी और न दुआ में ही उठे
नतीज़ा जो भी रहा, हाथ बढ़ाया न गया .
२५.०८.2010
कविता - 1
कला
कला तो है
पर तेरा काव्य उपयोगी नहीं है
कला की भूखी है दुनियां मनोरोगी नहीं है
कला परवान तब चढ़ती है
जब थाली से जुड़ती है
सियासी ऐश करती सोच कंगाली से जुड़ती है
गुलामी जुल्म पस्ती दर्द बदहाली से जुड़ती है
कला कविता पसीने की तरह से जब निचुडती है
विचारों की कलम से
दिल ने लिख्खी हो अगर कविता
तो भाषा लाँघ कर अनपढ़ भी पढ़ लेता है जस का तस
नवों रस से बड़ा होता है जीवन -रस .
कला तो है
पर तेरा काव्य उपयोगी नहीं है
कला की भूखी है दुनियां मनोरोगी नहीं है
कला परवान तब चढ़ती है
जब थाली से जुड़ती है
सियासी ऐश करती सोच कंगाली से जुड़ती है
गुलामी जुल्म पस्ती दर्द बदहाली से जुड़ती है
कला कविता पसीने की तरह से जब निचुडती है
विचारों की कलम से
दिल ने लिख्खी हो अगर कविता
तो भाषा लाँघ कर अनपढ़ भी पढ़ लेता है जस का तस
नवों रस से बड़ा होता है जीवन -रस .
गज़लें - 5
बिना बताए ज़ेहन में मेरे आने से रही
वो कोई बात अपने आप बताने से रही .
मैं कैसे उसके साथ एक ज़माने से रही
बगैर उसके नींद भी तो सताने से रही .
न कोई ख़त न कोई फ़ोन न चर्चा कोई
हवा तो ख़ैर हाल - चाल बताने से रही .
नदी हूँ , पाप - गांठ खोल तो सकती हूँ मगर
दिलों के बीच गांठ कोई लगाने से रही .
ज़रुरियात आदमी की अगर कम न हुईं
तो कायनात उसका ख़र्च उठाने से रही .
हमें ही स्याह और सफ़ेद में चुनना है मियां
कोई छड़ी तो राजनीति घुमाने से रही .
जला के भस्म अपने दिल का कोई दे दे तभी
उरूज अपने आप शायरी पाने से रही .
२४.८.१०
वो कोई बात अपने आप बताने से रही .
मैं कैसे उसके साथ एक ज़माने से रही
बगैर उसके नींद भी तो सताने से रही .
न कोई ख़त न कोई फ़ोन न चर्चा कोई
हवा तो ख़ैर हाल - चाल बताने से रही .
नदी हूँ , पाप - गांठ खोल तो सकती हूँ मगर
दिलों के बीच गांठ कोई लगाने से रही .
ज़रुरियात आदमी की अगर कम न हुईं
तो कायनात उसका ख़र्च उठाने से रही .
हमें ही स्याह और सफ़ेद में चुनना है मियां
कोई छड़ी तो राजनीति घुमाने से रही .
जला के भस्म अपने दिल का कोई दे दे तभी
उरूज अपने आप शायरी पाने से रही .
२४.८.१०
गजलें - 6
गोद में बच्चा लिए कोई ब्याहता
हो खड़ी जैसे मुजस्सम भव्यता |
मैंने तो बस इसलिए चाहा तुझे
कौन मेरी तरह तुझको चाहता |
कितने खुशकिस्मत हैं जो कह सकते हैं
माँ! बनाओ हलवा, पूडी, रायता |
थे तो बैठे खोल के दफ़्तर सभी,
कौन भिखमंगों से जाकर मांगता |
हम तो लड़ने के लिए तैयार हैं
पर हमें मालूम तो हो मुद्दाआ |
हो खड़ी जैसे मुजस्सम भव्यता |
मैंने तो बस इसलिए चाहा तुझे
कौन मेरी तरह तुझको चाहता |
कितने खुशकिस्मत हैं जो कह सकते हैं
माँ! बनाओ हलवा, पूडी, रायता |
थे तो बैठे खोल के दफ़्तर सभी,
कौन भिखमंगों से जाकर मांगता |
हम तो लड़ने के लिए तैयार हैं
पर हमें मालूम तो हो मुद्दाआ |
Monday, August 23, 2010
गज़लें - 4
दर्द भी है नींद भी तन्हाई भी
याद ऐसे में तुम्हारी आई भी |
अब तलक तो एक भरोसा था मगर
टल गयी अब ज़ख्म की सुनवाई भी |
दस्तरस में चाँद था तो आपके
दिल में थी जो बात लब पर आई भी ?
इतनी सस्ती हो गयीं आसानियाँ
काम अब आती नहीं कठिनाई भी |
अब किसे नालिश करूँ मेरे ख़ुदा
उन दरिंदों में था मेरा भाई भी |
पंच, पनघट, डीह, पंछी, सब के सब
चुप लगा गयी पोखरे की काई भी |
गाँव का हर आदमी धरने पे है
अलगू पांड़े, रामजस हलवाई भी |
गज़लें - 3
वो देखो वो टीवी के टावर पर चढ़ता चाँद
मुझे देखते देख लिया तो और अकड़ता चाँद .
पंद्रह दिन की रात की पाली वाली ड्यूटी है
दौड़ रहा है खिड़की - खिड़की ट्रेन पकड़ता चाँद .
चाँद रात में नदिया तीरे मैं तुम तन्हाई
लहर पकड़ती हुई लहर और चाँद पकड़ता चाँद.
रेत के नीले सागर में भूखे, टूटे, हारे
भटके हुए मुसाफ़िर जैसा आगे बढ़ता चाँद .
सुखिया दुनिया दुखियारों से मन बहलाती है
फांस लगी मेरी यादों में आके गड़ता चाँद.
धंधेबाजों जैसा अमृतसर में गुरुवाणी
और अजमेर शरीफ़ में जाके कलमा पढ़ता चाँद.
सूरज की बाइक से घायल नीले घुटनों पर
दर्द से पियराई रातों में पपड़ी पड़ता चाँद.
मुझे देखते देख लिया तो और अकड़ता चाँद .
पंद्रह दिन की रात की पाली वाली ड्यूटी है
दौड़ रहा है खिड़की - खिड़की ट्रेन पकड़ता चाँद .
चाँद रात में नदिया तीरे मैं तुम तन्हाई
लहर पकड़ती हुई लहर और चाँद पकड़ता चाँद.
रेत के नीले सागर में भूखे, टूटे, हारे
भटके हुए मुसाफ़िर जैसा आगे बढ़ता चाँद .
सुखिया दुनिया दुखियारों से मन बहलाती है
फांस लगी मेरी यादों में आके गड़ता चाँद.
धंधेबाजों जैसा अमृतसर में गुरुवाणी
और अजमेर शरीफ़ में जाके कलमा पढ़ता चाँद.
सूरज की बाइक से घायल नीले घुटनों पर
दर्द से पियराई रातों में पपड़ी पड़ता चाँद.
गज़लें - 2
हम वक़्त की ज़बान में ये बात कह रहे
ठहरे हुए समाज में भी लोग बह रहे .
अब ले कहाँ से आएं आलीशान ज़िन्दगी
जो है उसी को साफ - सूफ करके रह रहे .
कविता नहीं ये ज़िन्दगी है आप की हज़ूर
सहना है गर कठिन तो आप काहे सह रहे .
अपनी तो ज़िंदगी अदावतों में ही कटी
बच्चों के बीच में तो कम से कम सुलह रहे.
ईमेल,एस एम एस में, जेब में भी है मगर
दिल में भी तो सलाम - दुआ की जगह रहे .
ठहरे हुए समाज में भी लोग बह रहे .
अब ले कहाँ से आएं आलीशान ज़िन्दगी
जो है उसी को साफ - सूफ करके रह रहे .
कविता नहीं ये ज़िन्दगी है आप की हज़ूर
सहना है गर कठिन तो आप काहे सह रहे .
अपनी तो ज़िंदगी अदावतों में ही कटी
बच्चों के बीच में तो कम से कम सुलह रहे.
ईमेल,एस एम एस में, जेब में भी है मगर
दिल में भी तो सलाम - दुआ की जगह रहे .
Thursday, August 5, 2010
ग़ज़लें-1
ये मेरी आंख का देखा हुआ है
निगाह- ए - मीर को धोखा हुआ है .
तुम्हारा झूठ दीमक खा रहे हैं
मेरा सच आज तक रक्खा हुआ है .
अकीदों में नहीं हाँ पोथियों में
अँधेरा इन दिनों उजला हुआ है.
नदी में कोई तब्दीली नहीं है
मगर पानी जरा बहका हुआ है.
कि कोई सांस लेना भूल जाये
तुम्हीं सोचो कभी ऐसा हुआ है ?
हुए कागज़ पे जबसे रिश्ते पक्के
भरोसा थोड़ा सा कच्चा हुआ है.
मुकम्मल था मेरा ईमान पहले
ख़ुदा को देख कर आधा हुआ है.
21.07.2010
निगाह- ए - मीर को धोखा हुआ है .
तुम्हारा झूठ दीमक खा रहे हैं
मेरा सच आज तक रक्खा हुआ है .
अकीदों में नहीं हाँ पोथियों में
अँधेरा इन दिनों उजला हुआ है.
नदी में कोई तब्दीली नहीं है
मगर पानी जरा बहका हुआ है.
कि कोई सांस लेना भूल जाये
तुम्हीं सोचो कभी ऐसा हुआ है ?
हुए कागज़ पे जबसे रिश्ते पक्के
भरोसा थोड़ा सा कच्चा हुआ है.
मुकम्मल था मेरा ईमान पहले
ख़ुदा को देख कर आधा हुआ है.
21.07.2010
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