Thursday, August 26, 2010

कविताएँ - 4

राग-बाज़ार

सोच  रहा हूँ किसी तरह से
निकल आयें बस आम के दाम
औंधे मुंह हैं बाज़ारों में कोइलसिया गुठली के दाम .

मैनहटन से हगन हटी तक पैसा पैसा
बस पैसा
किसी ने अरबों खरबों देकर भी
एक साँस खरीदी क्या ?
खिचड़ी से हालात
कलेजा गुठली जैसा सख्त हुआ
नमक - पसीजे रिश्ते हो गए
काठ की हांड़ी वक्त हुआ
सुट्टा  मार के पूंजीवादी मार्क्सवाद का भक्त  हुआ .

ख़ता माफ़ हो गाँधी बाबा
जय मां दुर्गे लाल सलाम !

दिल की दूरी मंगल जितनी
और मंगल की चार परग
एक ही   प्लाट पर सच  और झूट के बंग्लें हैं पर अलग अलग .

मैन अज्ञानी क्या बतलाऊँ
आप सभी खुद ज्ञानी हो
जीवन बेशक घिसरौअवां हो पर सपना तूफानी हो
उनकी जेब में डालर हो
पर अपनी जेब में पानी हो .

अंत बचा के रख ले बुरबक
आयेंगे ईंधन के काम .

कविता - 3

देह रसगर

पड़ रही  हो जैसे हल्की हल्की छाया रोशनी पर
छू रहे आकाश को सहला रहा नीला समंदर
फाट पड़ने पड़ने को है देह रसगर .

दूध में जैसे बताशा घुल रहा है
शाम जैसे जैसे गहरी हो रही है     
वैसे वैसे रोशनी का रंग थोड़ा खुल रहा है
हो उठी है देह नागर, आदिवासी .

कर रही श्रृंगार मौसम के उदासी
जाने कैसी एक खुदाई चाल रही है मन के अन्दर
और उभरने लग गया है मुम्बई में एक बस्तर .

गाढ़ा गाढ़ा लिख गए हैं ढाई आखर
दिल के भीतर
ये तुम्हारे नयन पातर .

कविता - 2

यह कैसा जीवन


 यह कैसा आकाश
कि जैसे छूट रहा हो रंग
नई नीली साड़ी का .


यह कैसी धरती
जैसे उंगली से चाट रही अछ्वाइन 
 तेल निचोड़े बसियाइन  सी कोई जच्चा .


यह कैसा दिन
जैसे दौड़ो  दौड़ो देखो गाड़ी छूटी


यह कैसा जीवन
सबके सब साट रहे हैं
थूक लगा के नोट सटा के किस्मत फूटी .


यह कैसी है शाम
कि जैसी मटमैली  पियरी  पहने बादल
श्रम से लथपथ
लौट रहे अपने सूने अधियारे में फिर खो जाने को
पुनः जानवर हो जाने को .


यह कैसी हिंदी कविता
जिसमें फ़िराक़ के शेर गूंजते
मुक्तिबोध  शमशेर  समय की सूप फटकते
तिलमिलाए बाबा नागार्जुन पांव पटकते  .


यह कैसा समाज   यह कैसा जीवन
जिसमें  इतना जीवन
रिसता  घिसता  पिसता  जीवन
तुरपन जीवन    बंधन जीवन
सासों का अभिनन्दन जीवन
कोहबर से लेकर मसान तक
इतने रंग की इतनी भाषा
बासी पड़ी नहीं अभिलाषा
कौन समझ पाया   कब क्या है   जीवन के मन में .
२६/०८/२०१० 

Wednesday, August 25, 2010

गज़लें - 7

हवा का बोझ हवाओं से उठाया न गया
मेरे बदन का पसीना भी सुखाया न गया .
मैं उसके पास कई बार कई बार गया
मगर ख़ुदा से तो एक बार भी आया न गया .
दिमाग़ से तो उसे भूल गया हूँ कब का
न जाने क्यों वो मगर दिल से भुलाया न गया .
वो मेरे दर्द से वाकिफ़ था मैं उसके दिल से
न उससे पुछा गया , मुझ से बताया न गया .
जुड़े न हाथ कभी और न दुआ में ही  उठे
नतीज़ा जो भी रहा, हाथ बढ़ाया न गया .
२५.०८.2010

कविता - 1

कला

कला तो है
पर तेरा काव्य उपयोगी नहीं है
कला की भूखी है दुनियां मनोरोगी नहीं है

कला परवान तब चढ़ती है
जब थाली से जुड़ती है
सियासी  ऐश करती सोच कंगाली  से जुड़ती है
गुलामी जुल्म  पस्ती दर्द बदहाली से जुड़ती है
कला कविता पसीने की तरह से जब निचुडती  है

विचारों की  कलम से
दिल ने लिख्खी हो अगर कविता
तो भाषा लाँघ कर अनपढ़ भी पढ़ लेता है जस का तस
नवों रस से बड़ा होता है जीवन -रस .

गज़लें - 5

बिना बताए ज़ेहन में मेरे आने से रही
वो कोई बात अपने आप बताने से रही .
मैं कैसे उसके साथ एक ज़माने से रही
बगैर उसके नींद भी तो सताने से रही .
न कोई ख़त न कोई फ़ोन न चर्चा कोई
हवा तो ख़ैर हाल - चाल बताने से रही .
नदी हूँ , पाप - गांठ खोल तो सकती हूँ मगर
दिलों के बीच गांठ कोई लगाने से रही .
ज़रुरियात आदमी की  अगर कम न हुईं
तो कायनात उसका  ख़र्च उठाने से रही .
हमें ही स्याह और सफ़ेद में चुनना  है मियां
कोई छड़ी तो राजनीति घुमाने से रही .
जला के भस्म अपने दिल का कोई दे दे तभी
उरूज अपने आप शायरी पाने से रही .
२४.८.१०

गजलें - 6

गोद में बच्चा लिए कोई ब्याहता 
हो खड़ी जैसे मुजस्सम भव्यता |
मैंने तो बस इसलिए चाहा तुझे  
कौन मेरी तरह तुझको चाहता  |
कितने खुशकिस्मत हैं जो कह सकते हैं
माँ! बनाओ हलवा, पूडी, रायता |
थे तो बैठे खोल के दफ़्तर सभी,
 कौन भिखमंगों से जाकर मांगता |
हम तो लड़ने के लिए तैयार हैं 
पर हमें मालूम तो हो मुद्दाआ |