Thursday, September 9, 2010

गज़ल - 9

ज़िन्दगी क़ुदरत का है अलाहुनर
झुर्रियों से झुर्रियों तक का  सफ़र .
मौत के भूखंड पर निर्मित भवन
रह रहे अनुबंध पर हम ,लीज पर.
अब तो केवल 'हाए' का है आसरा
हो गई आवाज निर्बल इस कदर .
है सियासत से सियासत लापता
जैसे ख़बरों में नहीं होती ख़बर .
आदिवासी, नक्सली और संविधान
यूँ समझ लो इस  भंवर से उस भंवर .
जबरा  मारे और  रोवन भी न दे 
दावं पर है ज़िन्दगी , काहे  का डर .
शाम को घर आके हिंदी ख़ुश हुई
कोट -टाई अलगनी पर टांग कर .

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