Thursday, September 9, 2010

गज़ल - 9

ज़िन्दगी क़ुदरत का है अलाहुनर
झुर्रियों से झुर्रियों तक का  सफ़र .
मौत के भूखंड पर निर्मित भवन
रह रहे अनुबंध पर हम ,लीज पर.
अब तो केवल 'हाए' का है आसरा
हो गई आवाज निर्बल इस कदर .
है सियासत से सियासत लापता
जैसे ख़बरों में नहीं होती ख़बर .
आदिवासी, नक्सली और संविधान
यूँ समझ लो इस  भंवर से उस भंवर .
जबरा  मारे और  रोवन भी न दे 
दावं पर है ज़िन्दगी , काहे  का डर .
शाम को घर आके हिंदी ख़ुश हुई
कोट -टाई अलगनी पर टांग कर .

Friday, September 3, 2010

ग़ज़ल - 8

शब्द में घर कर रही चुप्पी को टोना चाहिए
क्रांतिधर्मी काव्य में भी मौन होना चाहिए .
शायरी में ज़िन्दगी और ज़िन्दगी में शायरी
भावना की आंच, भाषा का भगौना चाहिए .
उनकी कोशिश है की थोड़ा शोर , थोड़े नारे बस
अपनी कोशिश है की हंगामा भी होना चाहिए .
घर बसाने के लिए धरती भले ही कम पड़े
दिल बसाने के लिए बस एक कोना चाहिए .
हैं तो हैं रिश्ते , नहीं हैं तो नहीं हैं, और क्या
इनके चलते चैन अपना थोड़े खोना चाहिए .
सब तो हो जाता है आड़े-तिरछे  , आगे-पीछे पर
हो नहीं पता है बस वो ही जो होना चाहिए .
ग़ैर के पावों से चल के मंजिलें मिलतीं नहीं
अपना सपना अपने ही कन्धों पे ढोना चाहिए .
०२.०९.2010