कविता
भूख
बच्चा था तो परेशान रहती थी माँ
कुछ खाता नहीं
दुलरातीं फुसलातीं जबरिया खिलातीं
एक कौर कौआ का
एक कौर गइया का
एक कौर सुग्गा का
एक कौर मेरे मन्नू का
डाक्टर पीर पड़ोसन सबसे गा आतीं
कुछ खाता नहीं मेरा मन्नू
बड़ा हुआ तो रोटियां कम पड़ने लगीं --
जब देखो मुह चलता ही रहता --
मिठाई नमकीन बिस्कुट कहाँ चोरवा दिए जाएँ
कि मेहमानों के आने पर मुँह न ताकना पड़े
कम का न काज का नौ मन अनाज का
उमर ढली
कम होने लगी खुराक
बढ़ने लगी भूख माँ की
दो की जगह एक फिर आधी फिर.…
भूख ही नहीं
लस्त होता शरीर पस्त होती हिम्मत अस्त होती भूख
ग्रस्त होती सम्भावना
चलेंगी नहीं शायद
बचपन से लेके बुढ़ापे तक भूख केवल भूख
सुबह करो शाम का रोना
जीवन क्या बस भूख का होना
चिंतनीय शास्वत भूख
गोद से लेके चिता तक सुलगती रही हर जून भूख।
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