Sunday, March 23, 2014

कविता 

भूख 

बच्चा था तो परेशान  रहती थी  माँ 
कुछ खाता  नहीं 

दुलरातीं     फुसलातीं    जबरिया खिलातीं 
एक कौर  कौआ का 
एक कौर गइया का 
एक कौर सुग्गा का 
एक कौर मेरे मन्नू का 

डाक्टर  पीर पड़ोसन सबसे गा आतीं 
कुछ खाता  नहीं   मेरा   मन्नू 

बड़ा हुआ तो रोटियां कम पड़ने लगीं --
जब देखो मुह चलता ही रहता --
मिठाई नमकीन बिस्कुट कहाँ चोरवा दिए जाएँ 
कि मेहमानों  के आने पर मुँह न ताकना पड़े 
कम का न  काज का नौ मन अनाज का 

उमर ढली 
कम होने लगी खुराक 
बढ़ने लगी भूख माँ की 
दो की जगह एक फिर आधी फिर.…
भूख ही नहीं 
लस्त होता शरीर   पस्त होती हिम्मत   अस्त होती भूख 
ग्रस्त होती सम्भावना 
चलेंगी नहीं शायद 

बचपन से लेके बुढ़ापे तक भूख केवल भूख 
सुबह करो शाम का रोना 
जीवन क्या बस भूख का होना 
चिंतनीय    शास्वत भूख   
गोद से लेके चिता तक सुलगती रही हर  जून भूख। 

 




No comments:

Post a Comment