नीति , नीयत और नाक का प्रश्न
बुजुर्गों के साथ अक्सर यह दिक्कत आती है कि इन्द्रिया शिथिल पड जाने के कारण वे वही सुन पाते हैं जो उन्हें दूसरे सुना देते हैं .वही देख पाते हैं जो दूसरे उन्हें दिखा देते हैं .उम्र बढ़ जाने पर अपना कान अपना कान नहीं रहता , अपनी आँख अपनी आँख नहीं रहती .ऐसे में अपनी जबान अपनी जबान कैसे रह सकती है .राजनैतिक परिपक्वताविहीन व्यक्ति सदा दूसरों के हाथ में डमरू की तरह होता है .जो चाहे बजाले, मजमा लगा ले .राहुल, अरविंद ,किरण के बाद अब ममता अन्ना डमरू बजा रहीं हैं . उन्हें शायद नहीं मालूम कि अन्ना बिना मिलावट सिर्फ अनशन कर सकते हैं .उनकी बातों, विचारों ,और उनकी आस्था में पानी तलाशना चाँद पर भरोसा करना है .
इमान्दारी अच्छी चीज है परन्तु राजनीति में सिर्फ इमान्दारी ' बौउक' होती है .और बौउक किस्म कि राजनैतिक खतरनाक .आम अदमी की इसी बौउक इमान्दारी का शोषन खाई -अघाई पार्टी करती रही हैं .कुछ परिवारों के पास कई तरह के तीर और कई तरह के निशानें हैं .
साम्प्रदायिकता का तीर चलना है तो फलां पार्टी .गैर-साम्प्रदायिकता का तीर चलना है तो फलां पार्टी .दलित तीर के लिये फलां और समाजवादी तीर के लिये फलां .धनुष एक तीर अनेक .तीर और निशाने से ज्यादा महत्वपूर्ण धनुषधारी की पहचान बेनकाब करना है .बौक-ईमानदार अन्ना इसे समझना नहीं चाहते .पत्ते खुलते जा रहे हैं और अन्ना भी .कलतक वाया किरण बेदी ,अन्ना भ्रष्टाचार विरोधी लोकपाल का भाजपाई अजेंडा थे ,अब वे वाया संतोष भारतीय ईमानदारी का ममटाई अजेंडा हैं .डील अन्ना की थी कि किरण की ,कि अब संतोष की है ,पता नहीं .जो आरोप अरविंद के राजनैतिक विरोधी भी नहीं लगा सके , वह अन्ना ने लगा दिया--अरविंद लालची हैं .अगला आरोप शायद देशद्रोह का लगेगा .संविधान-द्रोही तो वे हैं ही .कौन सा संविधान, किसका संविधान ,कभी यह प्रश्न महत्वपूर्ण होता था ,अब रुपये में सोलह आने का है .आउटडेटेड.पहले कभी राजनीति में आने , पार्टियों से जुड़ने यानी राजनीति करने से अन्न-किरण ऐसे बिदकते थे जैसे लाल कपड़ा देख के सांढ़ बिदकता है .जब सामाजिक आंदोलन को राजनातिक धार देने का वक़्त-विचार आया तो अन्ना -किरण बिदक गये .उनकी राजनैतिक-सुचिता का एक मात्रा माप दंड , गैर-राजनैतिक रहना था .राजनीति सरकारी कर्मचारियों के लिये जिस तरह वर्जित है , वासे ही अन्ना के लिये थी, बावजूद इसके कि वे सरकारी नहीं हैं .यह और बात है कि सरकारी लोकपाल का उन्हों ने समर्थन किया। आप कि घोषणा होते ही अन्ना-मंदिर से अरविंद कुजात की तरह निकल दिये गये .तब साथ थीं किरण जो आज भाजपाई हो गईं . अन्ना गरियाते रहे ,परंतु जब आप को दिल्ली मे जनता ने २८ सीटें दे दीन तो वही अन्ना पूरी बेशर्मी से बोले--मई अरविंद के साथ घूमता तो उन्हें पूर्णा बहुमत मिलता .बधाई भी दी.मतलब? मतलब कुछ नहीं .कल जिस चश्में से देख रहे थे वा एंकर के सामने हड़बड़ी में गिर के टूट गया .तड़ाक से किसे और ने अपना( अपना, आप से बनता है) चश्मा उन्हें लगा दिया .दोष न चश्मे का न नज़र का डॉश है दृश्य का .यानी वस्तुनिष्ठता वस्तु में है ,प्रेक्षक में नहीं .है .नैतिक राजनीति से कम महत्वपूर्ण राजनैतिक नैतिकता नहीं होती इसे अन्ना समझ नहीं पा रहे हैं.अरविंद के पास कोई विज़न नहीं तो ममता के पास कौन सा विज़न है ?मगर उन्हें सूती साड़ी और हवाई चप्पल भा गई .'कितनी नावों पर कितनी बार का प्रश्न अन्ना के लिये बेकार है .सवाल नीति , नीयत और नाक का है.अन्ना की नीति--सामाजिक आंदोलन और अनशन. अन्ना की नीयत--जनता की सेवा और भ्रष्टाचार से मुक्ति .मगर अन्ना की नाक ? नाक बेचारी बीच में आ रही .कहाँ बचायें ,कहाँ कटाएँ, कहाँ घुसायें ?थोड़ी चर्चा आप की भी कर ली जाय .शरीर मिट्टी का बना है और अंत में मिट्टी में ही मिल जाता है .आप का गठन सोशल मीडिया और सड़क से हुआ है तो कहीं मीडिया और सड़क ही उसे खा न ले .आप कि चुनौती न मोदी हैं न राहुल .न अंबानी. न माया-मुलायम-ममता .आप की चुनौती सिर्फ आप है .आम आदमी पार्टी की चुनौती अन्ना नहीं , आम आदमी है .आप को देश व्यापी आधार दे पाना अरविंद के बस में नहीं दिखता .जो आप के नाम पर सुर्खरू हो रहे हैं उनका सच टिकट बटवारे को लेकर सामने आ रहाहै .रक्तहीन क्रांति का केजरीवाली सच .प्रति मिनट आनेवाले चंदे की राशि से नहीं , आपकी विश्वसनीयता आप के कामों से नापी जायगी .' थोडा लिखना बहुत समझना ' इस पर आप को कब भरोसा होगा .सादगी दिखानी नहीं पड़ती ' जनता देख लेती है। ममता की सादगी छिप नहीं पाई .यही हाल ईमानदारी का है .आप को तो जनता पर अगाध विश्वास है ,फिर इतना बड़बोलापन ? इतनी हड़बड़ी ,इतनी हाय-तोबा ?अपने उन्चास दिनो के करतब को बताने के लिये झूट का सहारा लेने की क्या जरूरत ?विशिष्ट अर्थों में 'राजनैतिक चेतना' का अभाव अगर अरविंद में है तो ममता में ? खासतौर पर तब जब 'राजनैतिक चेतना' ,'सत्ता-चेतना' में विघटित कर दी गई हो .अरविंद यदि फलां किताब से या फलां-फलां सिद्दांतो से नहीं बल्कि सीधे जनता से सीखना चाहते हैं तो इस में बुराई क्या है सिद्धांत रटे लोगों का साठसाला रिजल्टकार्ड जनता दीख चुकी है .सड़क की आवाज संसद में ले जाने के पहले वे संसद को सड़क पर ले आना चाहते है तो यह संसदीय-प्रक्रियावादी पार्टियों के गले नहीं उतरता है.उनके भी नहीं जिनकी पैदाइश संसद को सूअरबाड़ा समझने के साथ हुई थी .जनता की पाठशाला में न जाने का खामियाजा सभी पार्टियाँ भोग रही हैं ..कोई कह दे रहा है , कोई चुप है .यदि यही विदेश नीति है कि बांगलादेशी हिन्दू ग्राह्य है और बांगलादेशी मुसलमान घुसपैठी तो ऐसी विदेश नीति से तोबा .यदि धरा ३७० केवल सत्ता पाने का झुनझुना है तो ऐसी संविधान निष्टा से तोबा .यदि दिल्ली से चला १०० पैसा ब्लाक तक पहुचते पहुचते केवल २० पैसा रह जाता है तो ऐसी अर्थनीति से तोबा .यदि विकास का मतलब देश नहीं दो चार कुनबों का विकास है तो ऐसे विकास से तोबा . ऐसा कोइ ब्लूप्रिंट हमें नहीं चाहिए .परन्तु एक बात आज तक अनुत्तरित है .यदि दिल्ली की सर्कार दो चार दिन और च जाती तो क्या नुकसान देश का हो गया होता .संवैधानिक प्रक्रियाओं का पालन यदि इतना ही खतरनाक था तो उसे विधानसभा में बेनकाब क्यों नहीं कियागया .वैसे ही जैसे अम्बानी मामले में दोनों पार्टियों को बेनकाब किया गया था .
अन्ना ने अरविन्द को लालची क़रार दिया है I लालच सिर्फ पद पैसा या प्रतिष्ठा का ही नहीं होता है I कहीं अवचेतन में सम्मानित होते रहने ,किये जाने और , सम्मानित माने जाने की आकांक्षा भी लालच का रूप धारण कर लेती है I वही पद्म पुरस्कारों वाला लालच I हमें पता भी नहीं चलता कि हम लालची हैं और हम किन्ही हाथों का खिलौना बन जाते है I साहित्यिक पुरस्कारों से इसे जोड़ कर आसानी से समझा जा सकता है I अन्ना लालची नहीं हैं , परन्तु क्या अन्ना वास्तव में लालची नहीं हैं ? बावजूद इसके कि देश का अगला राष्ट्रपति अभी काल के गर्भ में है I अगला भारत रत्न भी I
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